संपत्ति एवं स्वत्व विवाद
संपत्ति विवाद इस बात का मतभेद है कि अचल संपत्ति का स्वामी कौन है, उसका कितना भाग किसका है, अथवा वह उसके साथ क्या कर सकता है। स्वत्व (टाइटल) विवाद इससे संकुचित प्रश्न है — कि जिस दस्तावेज़ पर व्यक्ति निर्भर है, वह वास्तव में उसे वह अधिकार देता है या नहीं जिसका वह दावा करता है।
कोलकाता में अधिकांश संपत्ति-मुकदमेबाज़ी तर्क से नहीं, काग़ज़ से आरंभ होती है। हस्तांतरण विलेख, उससे पूर्व की विलेख-शृंखला, नामांतरण अभिलेख, कर की रसीदें, स्वीकृत नक्शा और — जहाँ भूमि कभी किरायेदारी में अथवा किसी ज़मींदारी के अधीन रही हो — अधिकार-अभिलेख ही मामले को तय करते हैं। जहाँ दस्तावेज़ों की शृंखला अखंड और संगत है, वहाँ विवाद सामान्यतः व्याख्या का होता है। जहाँ कोई कड़ी अनुपस्थित, कूटरचित, अपंजीकृत अथवा कब्ज़े से असंगत है, वहाँ विवाद स्वत्व का ही होता है।
सामान्य प्रकार जाने-पहचाने हैं। सहस्वामी जिन्हें संपत्ति संयुक्त रूप से उत्तराधिकार में मिली और जिन्होंने कभी बँटवारा नहीं किया; वह विक्रेता जिसने एक ही भूखंड दो बार बेच दिया; वह सीमा-दीवार अथवा गली जो दशकों में कुछ फुट सरक गई; वह प्रोमोटर जिसने करार में वचन दी गई संपत्ति का हस्तांतरण नहीं किया; वह व्यक्ति जो दस्तावेज़ के बिना दीर्घकालिक कब्ज़े में है, अथवा वह जिसके पास दस्तावेज़ है पर कब्ज़ा नहीं; वह मुख़्तार जिसने दी गई शक्ति से आगे बढ़कर कार्य किया।
दोष के अनुसार माँगी जाने वाली राहत बदलती है — स्वत्व की घोषणा, संयुक्त संपत्ति का बँटवारा, कब्ज़े की वापसी, दस्तावेज़ का निरसन, निर्माण अथवा हस्तांतरण रोकने की निषेधाज्ञा, या इनका संयोजन। कौन सी राहत उपलब्ध है और किस परिसीमा-अवधि के भीतर, यह इस पर निर्भर करता है कि अधिकार से पहली बार इनकार कब किया गया — इसीलिए जिस दिन माँग ठुकराई गई अथवा कब्ज़े में बाधा पड़ी, वह तिथि विलेखों जितनी ही महत्वपूर्ण है।
चैंबर के अधिवक्ता संपत्ति एवं स्वत्व के मामले देखते हैं, जिसमें वाद से पूर्व की तलाश और निरीक्षण, प्रारूपण और दाख़िली, अंतर्वर्ती आवेदन, विचारण तथा डिक्री का निष्पादन सम्मिलित हैं। मामले कोलकाता के न्यायालयों में, तथा जहाँ संपत्ति अथवा पक्षकार अपेक्षा करें वहाँ भारत में अन्यत्र भी संचालित किए जाते हैं।
इस क्षेत्र में क्या आता है
- अचल संपत्ति में स्वत्व एवं स्वामित्व की घोषणा
- संयुक्त अथवा उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति का बँटवारा
- कब्ज़े की वापसी, तथा कब्ज़ाधारियों द्वारा और उनके विरुद्ध वाद
- विलेखों और दस्तावेज़ों का निरसन अथवा सुधार
- सीमा, सुखाधिकार, गली तथा रास्ते के अधिकार के विवाद
- निर्माण, हस्तांतरण अथवा बेदखली रोकने की निषेधाज्ञा
- विक्रय के करार, विकास करार तथा विनिर्दिष्ट पालन
- स्वत्व-शृंखला की तलाश, नामांतरण एवं अभिलेख का सत्यापन
ये मामले देखने वाले अधिवक्ता
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बिमलेश कुमार जैन
पचास वर्षों से अधिक समय से वकालत में — संपत्ति और वैवाहिक विधि सहित दीवानी मामलों में।
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आदित्य कुमार जैन
दस वर्षों से अधिक समय से वकालत में, मुख्यतः संपत्ति विधि में, सहयोगियों के दल के साथ।