उत्तराधिकार एवं विरासत
उत्तराधिकार वह विधि है जो तय करती है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी संपत्ति का क्या होगा — कौन उसे लेगा, किस अंश में, और उसे लेने वाले व्यक्ति को कोई संस्था अथवा क्रेता मान्यता देने से पहले कौन सा औपचारिक प्रमाण चाहेगी।
दो स्थितियों में भेद किया जाता है। जहाँ मृतक ने वैध वसीयत छोड़ी हो, वहाँ उत्तराधिकार वसीयती होता है और संपत्ति वसीयत के निर्देशानुसार न्यागमित होती है, बशर्ते वसीयत सिद्ध हो जाए। जहाँ वसीयत न हो, अथवा वसीयत सब कुछ न समेटे, वहाँ उत्तराधिकार निर्वसीयती होता है और संपत्ति उन वारिसों को मिलती है जिन्हें मृतक पर लागू विधि पहचानती है। दोनों स्थितियों में व्यावहारिक प्रश्न सामान्यतः एक ही होता है: कौन सा दस्तावेज़ बैंक, रजिस्ट्री, कंपनी अथवा क्रेता को संतुष्ट करेगा कि यह व्यक्ति संपदा के विषय में कार्य करने का अधिकारी है।
वह दस्तावेज़ स्थिति के अनुसार बदलता है। प्रोबेट वसीयत तथा उसमें नामित निष्पादक के विषय में न्यायालय का प्रमाणन है। प्रशासन-पत्र (letters of administration) वहाँ दिए जाते हैं जहाँ निष्पादक न हो, अथवा वसीयत ही न हो, और किसी को संपदा के प्रशासन के लिए प्राधिकृत करना आवश्यक हो। उत्तराधिकार प्रमाणपत्र इससे संकुचित है और ऋणों तथा प्रतिभूतियों से संबंधित है — जमा, अंश तथा मृतक को देय धन। इनमें से कौन आवश्यक है और किस न्यायालय को अधिकारिता है, यह इस पर निर्भर है कि मृतक कहाँ रहता था, संपत्ति कहाँ स्थित है और संपदा किन वस्तुओं से बनी है।
विवाद जाने-पहचाने रूपों में उठते हैं। कहा जाता है कि वसीयत कूटरचित है, अथवा तब बनाई गई जब वसीयतकर्ता उसे समझने की स्थिति में नहीं था, अथवा उस व्यक्ति के दबाव में बनी जिसे उससे लाभ होता है। बाद की कोई वसीयत सामने आ जाती है। कोई वारिस अभिलेख से छूट जाता है, अथवा ग़लत ढंग से जोड़ दिया जाता है। एक वारिस पूरी संपत्ति पर बैठ जाता है और शेष भीतर नहीं जा पाते। संपदा बाँट दी जाती है और तब कोई लेनदार प्रकट होता है। जहाँ संपत्ति संयुक्त रूप से उत्तराधिकार में मिली हो और सहमति से न बँट सके, वहाँ मामला बँटवारे का हो जाता है।
चैंबर के अधिवक्ता उत्तराधिकार एवं विरासत के मामले देखते हैं, जिसमें वसीयत का प्रारूपण, प्रोबेट, प्रशासन-पत्र तथा उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के आवेदन, कैविएट तथा विरोधित वसीयती कार्यवाहियाँ, और जहाँ संपदा सहमति से न बँट सके वहाँ बँटवारे तथा घोषणा के वाद सम्मिलित हैं। मामले कोलकाता के उन न्यायालयों में चलाए जाते हैं जिन्हें वसीयती अधिकारिता प्राप्त है।
इस क्षेत्र में क्या आता है
- वसीयत का प्रारूपण एवं पंजीकरण
- वसीयत का प्रोबेट तथा निष्पादक की नियुक्ति
- वसीयत अथवा निष्पादक न होने पर प्रशासन-पत्र
- ऋण, जमा तथा प्रतिभूतियों के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र
- कैविएट तथा विरोधित वसीयती कार्यवाहियाँ
- वारिसत्व सिद्ध करना तथा संपदा के अभिलेखों का सुधार
- वारिसों के बीच उत्तराधिकृत संपत्ति का बँटवारा
- निर्वसीयती न्यागमन तथा वारिसों के अंशों पर परामर्श
ये मामले देखने वाले अधिवक्ता
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बिमलेश कुमार जैन
पचास वर्षों से अधिक समय से वकालत में — संपत्ति और वैवाहिक विधि सहित दीवानी मामलों में।
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आदित्य कुमार जैन
दस वर्षों से अधिक समय से वकालत में, मुख्यतः संपत्ति विधि में, सहयोगियों के दल के साथ।